मुज़फ्फरनगर | 5 अप्रैल 2025
वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ जुम्मे और ईद की नमाज के दौरान काली पट्टी बांधने वाले नमाजियों को अब कोर्ट का सामना करना पड़ेगा। जिला प्रशासन ने इस शांतिपूर्ण विरोध को “शांति भंग” करार देते हुए सैकड़ों लोगों को 2 लाख रुपये के मुचलके का नोटिस भेज डाला है।
प्रशासन की तरफ से कहा गया कि काली पट्टी बांधना लोगों को उकसाने और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा था। नगर मजिस्ट्रेट विकास कश्यप के अनुसार, ये प्रदर्शन शांति व्यवस्था के खिलाफ था, इसलिए 16 अप्रैल को सभी को कोर्ट में पेश होने को कहा गया है।

लेकिन सवाल ये है – क्या शांतिपूर्वक विरोध जताना अब जुर्म हो गया है?
प्रदर्शनकारियों का दावा:
मस्जिदों के अंदर, बिना किसी नारेबाज़ी या सार्वजनिक प्रदर्शन के सिर्फ काली पट्टी बांधी गई थी।
कोई हिंसा या भड़काऊ हरकत नहीं की गई।
आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के शांतिपूर्ण आह्वान का अनुसरण किया गया।
मदरसा महमूदिया के प्रधानाचार्य नईम त्यागी का कहना है कि उन्होंने तो काली पट्टी बांधी भी नहीं थी, फिर भी उन्हें नोटिस भेज दिया गया और वारंट जारी कर दिया गया।
मोहम्मद शब्बीर ने बताया कि उन्हें व्हाट्सएप के जरिए मैसेज मिला था, जिसके आधार पर उन्होंने शांतिपूर्वक विरोध किया, मगर अब उनके अधिकार को “अपराध” की तरह देखा जा रहा है।
प्रशासन के इस फैसले से मुस्लिम समाज में गहरा रोष है।
लोग पूछ रहे हैं:
क्या अब विरोध जताना भी सजा के काबिल है?क्या ये कार्रवाई अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीधा हमला नहीं है?
और सबसे बड़ा सवाल – अगर काली पट्टी बांधना उकसावा है, तो कानून और संविधान की परिभाषा कहां जा रही है?
यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक संवैधानिक बहस बन चुका है। 16 अप्रैल को कोर्ट में क्या होगा, ये तय करेगा कि विरोध का हक़ बचेगा या नहीं।
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